भारतीय समाज सामूहिकता में जीने का आदी रहा है. यह वजह है कि देश के हर हिस्से में उसके पास अपना कोई एक समूह गायन और सामूहिक लोकनृत्य होता है. झारखंड में इसका नाम झूमर है, तो बंगाल में इस सामूहिक लोकनृत्य को झुमुर कहते हैं. उत्तराखंड में भी ऐसा एक लोकनृत्य है जिसे झोड़ा कहते हैं. यह नृत्य सामूहिक गान के साथ ही होता है.
कुमाऊं मंडल में कोई भी शुभ कार्य करने से पहले झोड़ा गाया जाता है. यह गीत सामूहिक रूप से गाया जाता है. इस गीत के साथ नृत्य भी किया जाता है. गोल घेरे में खड़े होकर एक दूसरे से हाथ व कंधा जोड़कर झोड़ा गाया जाता है. इस झोड़े का विशेष महत्व घर में शांति और नए कार्य की शुरुआत करने से पहले उस कार्य को सफल बनाने की प्रार्थना के रूप में है. झोड़े को आसान भाषा में मंगल गीत भी कहा जाता है. शादी विवाह से पहले या जनेऊ संस्कार से पहले घर में भगवान की कथा करने से पहले झोड़े गाने का रिवाज आज भी कुमाऊं में है.